जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर अबूझमाड़ के धुरबेड़ा गांव में गाज की चपेट में आने से 50 मवेशियों की मौत हो गई है। घटना के एक सप्ताह बीतने के बाद भी जिला प्रशासन को इसकी भनक नहीं लग पाई है। गांव में मातम छाया हुआ है। खेती- किसानी के सीजन में गाय और बैल की मौत से ग्रामीणों की कमर टूट गई है। 7 जून की सुबह आठ बजे के करीब मूसलाधार बारिश होने के बाद तेज हवाएं चलने लगीं। गांव के सारे मवेशी एक जगह जमा हो गए थे। उसी दौरान आकाशीय बिजली मवेशियों के उपर गिरी जिससे गांव के पूरे मवेशी मर गए।


धुर नक्सल प्रभावित इलाका में जिला प्रशासन की पहुंच नहीं होने से गांव के अंदर हुई इस घटना की जानकारी जिला मुख्यालय तक नहीं पहुंच पाई है। इधर मवेशियों की मौत की खबर देने के लिए ग्रामीण राशन और रामकृष्ण मिशन आश्रम की गाड़ी का इंतजार कर रहे हैं। नदी और नाले के बीच बसे गांव में बारिश के दिनों में जल स्तर बढ जाने से ग्रामीण पैदल नहीं आ पा रहे हैं। जिला प्रशासन के द्वारा बारिश से पहले धुरबेड़ा में चार माह का राशन पहुंचा दिया गया है। नईदुनिया से चर्चा में कोहकामेटा क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य गुड्डू नुरेटी ने बताया कि गुरूवार को उन्हें घटना की जानकारी धुरबेड़ा के पूर्व सरपंच मंगलू राम ध्रुव ने दी है।


नुरेटी ने बताया कि ग्रामीण मुआवजे के इंतजार में बैठे हैं। मुख्यालय आने के लिए वाहन उपलब्ध होने पर पूरा गांव आने को तैयार है। उन्होंने बताया कि लक्ष्मण धु्रव पिता गोसाय ध्रुव के 12 बैल खत्म हो गए हैं। वहीं वागलुराम पिता मुरा राम धु्रव की गाय और बैल मिलाकर 12 मवेशी मरे हैं। मासे बाई पति संतुराम के 06 , फागुराम पिता करिया के 04, इरगुराम पिता मालसाय के 05, विज्जा राम पिता करिया के 03, मिरिया राम पिता गागरू राम के 03, काना पिता टंगरा राम के 01 व जुरिया पिता मासाराम के 02 मवेशियों की मौत हुई है।

 

संक्रमण का खतरा बढ़ा

बस्ती के करीब बड़ी संख्या में मवेशियों की मौत हो गई है। ग्रामीणों ने मृत मवेशियों के उᆬपर कपड़ा डाल दिया है। घटना के एक सप्ताह बाद भी यह वहीं पडे हैं जिससे आसपास बदबू फैलने लगी है। मृत मवेशियों से गांव में संक्रमण फैलने का खतरा बढ गया है। गांव में अबूझमाडिया जनजाति के लोग बसे हैं। यहां की संस्कृति में मृत गाय और बैल का मांस खाने की परंपरा नहीं है क्योंकि वे गाय- बैल को देवी और देवता के बराबर मानकर पालते हैं।