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 शादी के बाद बराबर हों युवक-युवती के कर्त्तव्य और भूमिका,(लक्ष्मी)

09 Oct 2019 05:22pm | Indian News Service


 
आखिर क्यों शादी की जिम्मेदारियों को स्त्रियों के कंधों पर ही डाल दिया जाए?

भारतीय समाज में शादी के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को स्त्रियों के कंधों पर ही डाल दिया जाता है। अब समय आ गया है कि दोनों ही साथी इन जिम्मेदारियों को साझा करें और उनके समान अधिकार हों। 

आखिर क्यों शादी की जिम्मेदारियों को स्त्रियों के कंधों पर ही डाल दिया जाए?

पिछले कई वर्षों से बहुत से मुद्दों पर गरमागरम बहस लोगों के सामने आई हैं। महिला सशक्तिकरण का विषय इस डिबेट के केंद्र में रहा है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही हैं। लेकिन जब हम बात घर के भीतर की करते हैं तो ज्यादातार जगहों पर उनका रोल कुछ अटपटा सा लगता है। मौजूदा दौर में भी अधिकतर लोगों का स्त्रियों के बारे में यही मानना होता है कि आखिर लड़कियों का काम एक अच्छी बीवी और एक अच्छी मां होना ही तो है। 

जब भी एक पुरुष और स्त्री विवाह के बंधन में बंधते हैं तो यह कहा जाता है कि वह एक दूसरे के अर्धांग अर्थात बेटर हाफ हैं, तो ऐसे में उन्हें सारी घरेलू जिम्मेदारियों को भी साझा करना चाहिए। जीवन में आने वाले हर उतार-चढ़ाव में एक साथ एक दूसरे के साथ खड़ा होना होगा। सदियों से चली आ रही पुरुष सत्तात्मक सोच ने हमारी सोच को केवल यहीं तक सीमित कर दिया है कि स्त्रियाँ केवल घरेलू देखभाल के लिए होती हैं, जबकि पुरुष को अपने परिवार के लिए आर्थिक साधन जुटाने चाहिए। 

भारतीय संस्कृति और समाज में शादी की एक और कड़वी सच्चाई यह भी है कि यहां पर शादी दो लोगों के बीच जिम्मेदारियों को निभाने का मामला न होकर, केवल उन कर्त्तव्यों को पूरा करने का मामला होता है, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। अब समय आ गया है कि इन सभी संकीर्ण बातों से ऊपर उठा जाए। 
 

लिंग आधारित जिम्मेदारियों या भूमिकाओं पर भरोसा न करें: बिपोर्शी दास

एक फ्रीलांस कंटेंट राइटर बिपोर्शी दास का कहना है कि “हमने कभी एक दूसरे को कोई काम करने के लिए नहीं कहा। जो परंपरागत लिंग आधारित सोच थी, वह हमारे दिमाग तक आई ही नहीं। हम इस रिश्ते में एक दूसरे को बराबर मानते हैं और हमारे एक से कमिटमेंट हैं। हम दोनों ही एक दूसरे की पेशेवर और निजी स्पेस का ध्यान रखते हैं। हम दोनों के बीच किसी भी तरह का कोई ईगो का मुद्दा नहीं है। हम दोनों समान है। दोनों की घर में बराबर भूमिका, अधिकार व कर्त्तव्य हैं। तुम्हें कोई काम इसलिए नहीं करना है कि क्योंकि तुम एक औरत हो या आदमी होने के कारण मैं ही इकलौता कमाने वाला नहीं हो जाता।”

हमने चुनौतियों पर एक साथ विजय पाने की कसम खाई: शिवी वर्गीस

30 साल की शिवी वर्गीस की शादी पिछले साल हुई, उन दोनों के लिए कुछ नहीं बदला। वह कहती है “मेरे लिए, अपने साथी का साथ देना और उसे जीवन में और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना सबसे ज्यादा जरूरी है। मैंने उसके साथ रहने की कसम खाई है, फिर चाहे कुछ भी हो, कितने भी बुरे दिन आएं, हमारे रास्ते में कितनी भी परेशानियां आएं, मैं उसके हर काम में हर शुरुआत में उसकी सबसे अच्छी दोस्त और साथी बनकर रहना चाहती हूँ और उसके साथ हर लम्हा साझा करना चाहती हूँ। और हाँ, हम लोग खूब सारे कुत्ते पालना चाहते हैं।”
 

मैं अपने साथी के साथ गलतियां करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूं: अंकित वर्लानी

अंकित वर्लानी और उनकी पत्नी मानसी के लिए, उनकी शादी एक लम्बे समय की दोस्ती जैसी ही है। वह अपने दिल की बात एक दुसरे से कहते हैं, वह पूरी दुनिया में घूमते हैं और वह नए नए खाने तलाशते हैं और वह अपने दो साल के बच्चे वेद पर पूरा ध्यान देते हैं। अंकित का कहना है “मैं हर तरह से उसे अपना जीवनसाथी कहना चाहता हूं। मैं उसके साथ बेवकूफी वाले फैसले करना चाहता हूं, जंक फ़ूड खाना चाहता हूं, एक मजेदार पिता बनना चाहता हूं, पैसे के प्रति लापरवाह रहना चाहता हूं और एक दिन ऐसा करते हुए इन कहानियों को सुनाते हुए बूढ़ा होना चाहता हूं। क्योंकि मेरे लिए यही सब मायने रखता है कि हम क्या करते हैं। हमने एक समझौता किया हुआ है कि हम एक दूसरे के सबसे अच्छे और आखिरी रूम पार्टनर होंगे।” 

हम एक दूसरे के साथ रहेंगे, फिर चाहे कैसे भी हालात हों: पूर्णिमा भारद्वाज

“इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हालात कैसे भी हों, हमने हर उतार चढाव में एक साथ रहने की कसम खाई है। अब इसका मतलब यह भी हो सकता है कि हमारे पास पैसे की कुछ कमी हो जाए या फिर ऐसा भी हो सकता है कि हममें से एक कोई एक या दोनों ही पूरी रात पार्टी करें! मतलब हालात कैसे भी हों, हमें एक साथ रहना है। हम लोगों के विचार अलग हो सकते है, जीवनशैली अलग अलग हो सकती है, मगर इसका मतलब नहीं है हम एक दूसरे को सपोर्ट न करें। हम हर हाल में एक दूसरे को सपोर्ट करेंगे।” यह कहना है पूर्णिमा भारद्वाज का, जो स्काईवेज ग्रुप में रिसर्च एवं एनालिटिक्स असिस्टेंट मैनेजर हैं।

साकार होना चाहिए 'साथी साथ निभाना' का मतलब

यह सही है कि आज के युवा लिंग आधारित नियमों से नाता तोड़ रहे हैं और एक प्रगतिशील समाज और विचारों को अपना रहे हैं। लेकिन जरूरत के घर के भीतर के माहौल को बदलने की भी है। घर में भूमिकाएं पुरुष और स्त्रियों के बीच बांटी गयी हैं, उनमें जो लचीलापन गायब है उससे भी बचें। इसका मतलब है कि पुरुष और स्त्रियों को घरेलू और बाहरी दोनों ही जिम्मेदारियों को आधा आधा बांटना होगा। शोध के अनुसार जितनी ज्यादा लचीली भूमिकाएं होंगी उतने ही वह लोग खुश रहेंगे। इतना ही नहीं लचीलापन ही वह विचार है जिसके हिसाब से आज के बच्चे सोचते हैं, वह अपने हर दृष्टिकोण में लचीले हैं और वह सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं। 

कहा जाता है कि शादियां और जोड़ियां तो स्वर्ग से ही बनकर आती हैं... क्यों न हम यह बात दोनों साथियों के लिए होने दें।”


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