बंगाल में ममता बनर्जी की जीत के मुख्‍य कारण, किन नारों और मुद्दों से सत्‍ता में फिर लौटी तृणमूल कांग्रेस

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भाजपा के पास न तो मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा था और ना ही कोई तेजतर्रार महिला नेता जो ममता को उनकी शैली में जवाब दे पाता। भाजपा का मुकाबला कर रहीं ममता का नंदीग्राम में प्रचार के दौरान घायल होना भी निर्णायक बातों में एकरहा।

बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा, ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को सत्ता से हटाने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई। विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी की तेजतर्रार छवि, बंगाली अस्मिता, महिलाओं और अल्पसंख्यकों का टीएमसी की ओर बड़ा झुकाव का सीधा फायदा तृणमूल को मिला।

दरअसल, तृणमूल ने भाजपा की हिंदू वोटों की ध्रुवीकरण की कोशिश की काट करने के लिए 'बंगाल को चाहिए अपनी बेटी का नारा देकर महिला वोटरों को बड़े पैमाने पर अपने पाले में खींचा। ममता ने 50 महिला उम्मीदवारों को इसी रणनीति के तहत इस बार मैदान में भी उतारा था। इसके साथ ही दूसरे राज्यों से आने वाले भाजपा नेताओं के ममता बनर्जी पर सीधे हमले के मुद्दे को भुनाते हुए टीएमसी ने स्थानीय बनाम बाहरी का दांव खेलकर बांग्ला संस्कृति, बांग्ला भाषा और बंगाली अस्मिता के फैक्टर को हर जगह उभारा।पूरे चुनावी अभियान में बंगाल की बेटी और बाहरी का मुद्दा तृणमूल ने जोर-शोर से उठाया और यह दांव उसकी जीत में काफी काम आया। ममता लगातार अपनी चुनावी रैलियों में कहती दिखीं कि वह गुजरात के लोगों को बंगाल पर शासन नहीं करने देंगी। उनका इशारा मोदी व शाह पर था। साथ ही दूसरे राज्यों से यहां भाजपा के प्रचार के लिए आए नेताओं को वह लगातार बाहरी गुंडा कहकर संबोधित करतीं रहीं। इसके जरिए उन्होंने जमकर बंगाली कार्ड खेला। इससे खासकर महिलाओं के साथ बंगाली जनमानस का भरोसा जीतने में ममता कामयाब रहीं।

                                                                        भाजपा के पास न तो मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा था और ना ही कोई तेजतर्रार महिला नेता जो ममता को उनकी शैली में जवाब दे पाता। भाजपा की भारी-भरकम चुनावी मशीनरी का अकेले मुकाबला कर रहीं ममता का नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान घायल हो जाना भी निर्णायक बातों में एक रहा। ममता बनर्जी ने चोट के बावजूद व्हील चेयर से ही जिस तरह से लगातार धुआंधार प्रचार किया और भाजपा नेतृत्व के खिलाफ आक्रामक हमला बोला, उससे यह छवि बनी कि घायल शेरनी ज्यादा मजबूती से मोर्चा संभाले हुए हैं। ऐसे में सहानुभूति की फैक्टर भी उनके पक्ष में गया।दूसरा, चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी पर पीएम मोदी, अमित शाह जैसे बड़े केंद्रीय नेताओं का सीधा हमला भी उनके लिए सहानुभूति का काम कर गया। दीदी ओ दीदी, दो मई-दीदी गईं, दीदी की स्कूटी नंदीग्राम में गिर गई जैसे बयान भाजपा पर उल्टे पड़े। बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष का ममता के लिए बरमूडा वाला बयान भी महिलाओं के बीच अच्छा संदेश नहीं गया। इन बयानों को भुनाने में टीएमसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सहानुभूति कार्ड काम आया और यह ममता के पक्ष में गया। इसी का परिणाम है कि लगातार तीसरी बार ममता बंगाल की सत्ता पर काबिज होने पर कामयाबी हासिल की है।

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