तब और अब चुनाव की प्रक्रिया में काफी अंतर आ गया है। आज चुनाव में खड़े होने से पहले प्रत्‍याशियों को काफी कुछ समझना और बूझना पड़ता है। चुनाव में लडऩे से ज्यादा उसमें हुए व्यय का हिसाब-किताब देना मुश्किल भरा काम होता है। वैसे दौर वह भी था जब चुनाव लडऩे के बाद प्रत्याशी खर्च का विवरण अपने लेटरपैड पर ही लिखकर दे देते थे और निर्वाचन आयोग उसे स्वीकार कर लेता था। 

Lok Sabha Election 2019 : सिर्फ लेटरपैड पर ही प्रत्याशी दे देते थे चुनावी खर्च का हिसाब

अब है कठिन प्रक्रिया
यह बदलाव आया टीएन शेषन के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने के बाद। उन्होंने पारदर्शी प्रक्रिया के लिए इतना कड़ा पैमाना बनाया कि अब प्रत्याशी को चुनाव में इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि तय सीमा से अधिक खर्च न होने पाए। हालांकि चार्टर्ड एकाउंटेंट उनके इस काम को आसान कर देते हैं, फिर भी सिरदर्द तो रहता ही है। यदि समय सीमा में विवरण नहीं दिया तो चुनाव रद हो सकता है। साथ ही अगले कई सालों के लिए उम्मीदवारी पर भी रोक लगाई जा सकती है। 

चुनाव प्रक्रिया में बदलाव का दौर 90 के दशक से दिखा 
चुनाव प्रक्रिया में बदलाव का दौर 90 के दशक में शुरू हुआ। इससे पहले तक राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के खर्च को लेकर इतनी सख्ती नहीं थी। तब चौक-चौराहों से लेकर गली-मोहल्लों तक और गांव-कस्बों में हर तरफ प्रत्याशी के बैनर, पोस्टर, होर्डिंग नजर आते थे। चुनाव में कितनी रकम खर्च होगी, इसकी भी चिंता नहीं करनी होती थी। चुनाव खर्च का ब्योरा कितना आसान था, उसके लिए एक प्रसंग यहां उल्लेखनीय है। 

जनेश्वर ने लेटरपैड पर चुनाव में खर्च का हिसाब लिख डीईओ को सौंप दिया

इमरजेंसी खत्म होने के बाद वर्ष 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में इलाहाबाद संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी विश्वनाथ प्रताप सिंह का मुकाबला जनता पार्टी के प्रत्याशी जनेश्वर मिश्र से था। दोनों प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशियों के साथ अन्य प्रत्याशियों ने प्रचार-प्रचार पर खूब रकम खर्च की। जनेश्वर मिश्र के शिष्य रहे समाजवादी नेता कृष्ण कुमार श्रीवास्तव बताते हैैं कि चुनाव में जनेश्वर मिश्र की जीत हुई। इसके बाद चुनाव में खर्च की गई रकम का हिसाब देने का वक्त आया। जनेश्वर मिश्र ने अपने लेटरपैड पर पूरे खर्च का हिसाब लिखकर जिला निर्वाचन अधिकारी को सौंप दिया और उसे स्वीकार भी कर लिया गया। 

अब चुनाव से पहले प्रत्याशी को बैंक में खाता खुलवाना पड़ता है

मौजूदा दौर में नामांकन के पहले ही प्रत्याशी को चुनाव खर्च के लिए बैैंक में खाता खुलवाना पड़ता है। खाते में कितनी रकम रखी गई है, इसका विवरण नामांकन पत्र में देना होता है। इस खाते में चुनावी खर्च के लिए रकम निकाली जाती है। फिर चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद बाकायदा सीए से आडिट कराया जाता है। महीने भर में यानि 30 दिन के भीतर निर्वाचन कार्यालय को रिपोर्ट देनी होती है।