बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मुंबई में हुए विवादित खिचड़ी घोटाले के आरोपी शिवसेना यूबीटी नेता सूरज चव्हाण को जमानत देने का आदेश दिया है। यह मामला कोरोना महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों को वितरित खिचड़ी पैकेट से जुड़ा है, जिसमें करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोप लगे थे। जस्टिस मिलिंद जाधव की पीठ ने जमानत पर फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपी सूरज चव्हाण को जेल में एक साल से अधिक समय हो गया है और इस मामले की सुनवाई जल्दी समाप्त होने की संभावना नहीं है।
अदालत का बयान: “लंबा कारावास नहीं हो सकता न्यायसंगत”
अदालत ने यह साफ किया कि आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। यह अनुच्छेद न्यायपूर्ण और त्वरित सुनवाई का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। गौरतलब है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने चव्हाण को जनवरी 2024 में गिरफ्तार किया था। चव्हाण शिवसेना यूबीटी के युवा संगठन युवा सेना का समिति सदस्य है। इस मामले में शुरुआत में मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने जांच कर प्राथमिकी दर्ज की थी, बाद में इसे ईडी को सौंप दिया गया।
क्या है खिचड़ी घोटाला?
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अनुसार, मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने प्रवासी मजदूरों को खिचड़ी के पैकेट वितरित करने के लिए 8.64 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था। आरोप है कि इस राशि में से 3.64 करोड़ रुपये का गबन किया गया। जांच में यह भी पाया गया कि 1.25 करोड़ रुपये कथित तौर पर आरोपी सूरज चव्हाण के खाते में स्थानांतरित किए गए। इसके अलावा, 10 लाख रुपये उनकी साझेदार फर्म फायर फाइटर एंटरप्राइजेज को भेजे गए। ऐसा भी दावा किया गया कि चव्हाण ने इन पैसों में से 1.35 करोड़ रुपये का उपयोग संपत्ति खरीदने और डेयरी उद्योग में निवेश के लिए किया।
यह मामला राजनीति और प्रशासन में हुई आर्थिक अनियमितताओं का बड़ा उदाहरण है। जबकि हाईकोर्ट का जमानत पर फैसला आरोपी की लंबी हिरासत के संदर्भ में संविधान और मानवाधिकार की रक्षा को मजबूत करता है, यह देखना बाकी है कि इस मामले में आगे की जांच और सुनवाई क्या मोड़ लेती है।
