केंद्रीय बजट 2026-27 में जिस तरह ग्रामीण रोजगार की अनदेखी की गई है, उससे भी चिंता बढ़ती है। सरकार मनरेगा की जगह बीजीएमजी जैसा कानून तो ले आई है, जिसमें केंद्र सरकार ज्यादातर राज्यों में इस योजना का लगभग 60 प्रतिशत खर्च उठाएगी, और बाकी खर्च राज्य सरकारें देंगी। लेकिन बजट में इस मद में 65.9 प्रतिशत की कटौती की गई है, जो इस खर्च बंटवारे से कहीं ज्यादा है। मनरेगा के लिए 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान रुपए 88,000 करोड़ था। इसके उलट 2026-27 के बजट अनुमान में यह आंकड़ा घटाकर 30,000 करोड़ कर दिया गया है, जो 58,000 करोड़ या लगभग 66 प्रतिशत की कटौती है। इससे गंभीर सवाल उठता है कि क्या बीजीएमजी कानून के बताए गए लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मोदी सरकार ने पर्याप्त संसाधन रखे थे या फिर कांग्रेस की चिंताएं वास्तविक हैं कि गांव के गरीबों को मिलने वाली मामूली मजदूरी पर भी उद्योगपतियों का डाका पड़ चुका है? गरीब-गरीब की माला जपते हुए नरेंद्र मोदी हर बार उद्योगपतियों का ही हित साधते हैं, तभी 5 किलो मुफ्त अनाज लेने की नौबत देश में बनी हुई है।

